सरसों है खिला खिला धरा हुई पीली पीली आया है बसंत ऋतु खुद को संभालिये। सरसों है खिला खिला धरा हुई पीली पीली आया है बसंत ऋतु खुद को संभालिये।
हाँ...! यह सच है मैं हर रोज़ मारती हूँ स्वयं को। हाँ...! यह सच है मैं हर रोज़ मारती हूँ स्वयं को।
यह भी समझ नहीं पाते, धृतराष्ट्र पुत्रों को माधव, नहीं मारना चाहूं यादव। यह भी समझ नहीं पाते, धृतराष्ट्र पुत्रों को माधव, नहीं मारना चाहूं यादव।
शेर दहाडता भी है और मारता भी है... लेकिन कब, जब उसे भूख लगती है या उसे किसीसे खतरा महसूस हाेता है...... शेर दहाडता भी है और मारता भी है... लेकिन कब, जब उसे भूख लगती है या उसे किसीसे खत...
किसी को कुछ ना देने वाला हूं फकीर मैं तो किसी को कुछ ना देने वाला हूं फकीर मैं तो
दुनिया को मिले जहाँ स्वार्थ वो तो बस वही होगा। दुनिया को मिले जहाँ स्वार्थ वो तो बस वही होगा।